किसान की स्थिति

जिले में किसान अपनी कुछ मांगों को मनवाने के लिए हिंसक प्रदर्शन और आंदोलन कर रहे हैं.. वे सब्जियां फल एवं दूध सड़कों पर फैला कर विरोध कर रहे हैं. 

उनकी कुछ मांग इस प्रकार हैं- कर्ज माफी, दूध के रेट बढ़ाएं जाएं ,फसल के खर्च का डेढ़ गुना दाम मिले,  किसानों पर दर्ज केस वापस लिए जाएं… और महाराष्ट्र में भी किसान आंदोलन चल रहा है ..वहां किसानों की इसी प्रकार की मांगे हैं -कर्जमाफी, प्रोडक्शन कॉस्ट से 40 परसेंट ज्यादा एमएसपी, पेंशन, बिना ब्याज का लोन इत्यादि इत्यादि.. ( मेरी जानकारी का स्रोत दैनिक भास्कर है)

 अगर एक सीधा आकलन किया जाए तो किसान इस प्रकार की मांग कर रहे हैं जिन्हें एक स्वतंत्र बाजार अर्थव्यवस्था में सरकार के नियंत्रण में होना ही नहीं चाहिए 

इस  को पढ़कर कुछ लोगों को लग सकता है कि मैं किसान विरोधी हूं लेकिन वास्तविकता में अपनी निजी अनुभवों एवं अर्थव्यवस्था की सरल समझ के आधार पर ही मैंने अपनी राय बनाई है और मैं किसानों की चिंता करते हुए देखने की बजाए हालात के वास्तविक सुधार के बारे में काम करना पसंद करता हूं..

 इस आंदोलन के पीछे जो मूल अवधारणा है वह कल्याणकारी राज्य की अवधारणा है. या यह है कि हम कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से भ्रमित हो चुके हैं.. किसान चाहते हैं कि सरकार अपने revenue से उनके कर्ज की भरपाई करें , मार्केट रेट से अधिक कीमत दें, और उनके रिस्क को अपने खजाने पर बहन करे. 

मैं मंदसौर का नहीं हूं लेकिन मुरैना के एक किसान का ही बैठा हूं.. मैंने गांव को बेहद नजदीक से देखा है मैंने अपने अनुभवों के आधार पर ही यह निष्कर्ष निकाले और इसी के आधार पर मैं कह सकता हूं कि किसानों की खस्ता आर्थिक हालत के असली कारण क्या है.. पहला कारण है कृषि में रोजगार पाने वाले लोगों की संख्या कृषि क्षेत्र की आवश्यकता से बहुत अधिक है इसके कारण किसान अपनी खेती करने की पद्धति को आधुनिक करने के लिए आवश्यक पूंजी कभी जमा ही नहीं कर पाता.. खेतों का आकार छोटा होता जा रहा है.. लोगों की संख्या अधिक होने के कारण मशीनीकरण की ओर बढ़ना भी लाभप्रद नहीं हो पाता जिससे प्रगति की रफ्तार बहुत धीमी हो जाती है ..पूंजी निर्माण हो नहीं पाता है खेत छोटे हो जाते हैं इसलिए उनका आधुनिकीकरण भी नहीं हो पाता है 

दूसरा कारण गांव के लोग बैंक से लोन लेते ही नहीं है ..अक्सर यह बातें की जाती है कि किसान कर्ज न चुकाने की वजह से आत्महत्या कर लेते हैं वास्तविकता यह है कि उनके आत्महत्या करने के और भी दूसरे बहुत से कारण हैं जिन पर हमारा ध्यान ही नहीं जा पाता है. . किसान क्रेडिट कार्ड में इतनी धांधली है कि यह क्रेडिट कार्ड उस व्यक्ति के पास नहीं होते जिस जरूरत है बल्कि उसके पास होते हैं जो इनको बनवाने की बारीकियों को जानता है और रिश्वत देने की art में प्रवीण है.. .ज्यादातर गरीब किसान धनी एवं Dabangg किसानों से ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज लेते हैं ..यह कर्जदाता कोई गारंटी नहीं लेते बल्कि अपने बल पर शक्ति से अपने कर्ज की वसूली करते हैं ..मेरे गांव में कई किसान इस प्रकार की कर्ज बांटने की व्यवस्था से धनी हो गए हैं… जो लोग कर्ज़ लेते हैं , खेती के लिए तो शायद ही कभी लेते हैं.. ज्यादातर तो लड़की की शादी किसी परिजन की मृत्यु भोज के लिए ,बीमारी आदि के इलाज करने के लिए और कभी-कभी कुछ विलासिता की चीजें जैसे TV आदि खरीदने के लिए फोन खरीदने के लिए .;और कभी-कभी जुए में हार जाने की वजह से भी कर्ज लेते हैं क्योंकि इनमें से कोई भी उत्पादक कार्य नहीं हो सकता इसलिए किसान debt trap mein फस जाता है .. 

अधिकतर अनाज की फसल होती हैं इसका कारण है कि भी दूसरी उपयोगी फसले जैसे फल सब्जियां तिलहन दल्हन  की तकनीक में भी  किसान उतना नहीं पारंगत हो पाया है. सब्जियों  के भंडारण की भी व्यवस्था उतनी अच्छी नहीं है जिसके कारण किसान लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रख सकता और उनके बजाय मूल्य पाने का इंतजार नहीं कर सकता. .उसे अपनी फल और सब्जियां तुरंत बेचने पड़ते हैं …स्थिति तब और खराब हो जाती है जब किसी फसल के अधिक उत्पादन की वजह से उसकी कीमत  एकदम नीचे आ जाती हैं कई बार तो ऐसी स्थिति आ जाती है कि उसे अपनी लागत भी पूरी नहीं मिल पाती ऐसी स्थिति ही किसानों के लिए सबसे भयानक होती है …न्यूनतम समर्थन मूल्य का जो कांसेप्ट आया है वह भी इसी भयानक स्थिति से बचने के लिए आया है… भंडारण की कमी की वजह से बहुत बड़ी मात्रा में उत्पादित माल नष्ट हो जाता है  ..  

 उसका माल कई उपभोक्ताओं से होकर कई बिचौलियों से होकर उपभोक्ता तक पहुंचता है जिसके कारण उपभोक्ता को तो कीमत अधिक चुकानी पड़ती है लेकिन वह मूल्य किसान तक हस्तांतरित नहीं हो पाता है परिणाम स्वरुप बाजार में बढ़ रही महंगाई किसान तक नहीं पहुंच पाती और किसान गरीब का गरीब रह जाता है   

 आज खेती बड़े पैमाने पर बारिश पर निर्भर है ..कहीं-कहीं पर सिंचाई के लिए ट्यूबवेल और नहर आदि का प्रयोग किया जा रहा है लेकिन इससे भूमिगत जल का छरण भी लगातार हो रहा है और वह इतना कम हो गया है कि अब उसके रिचार्ज करने के बारे में सोचना अत्यंत जरुरी हो गया है .. 

सिंचाई और जुताई अभी भी अवैज्ञानिक तरीकों से की जा रही है आधुनिक बीजों कीटनाशकों खरपतवारनाशकओं का प्रयोग तो न के बराबर किया जाता है. . मिट्टी के परीक्षण किए जाने के बारे में तो कोई जानता ही नहीं है.. और रासायनिक खादों का प्रयोग अंधाधुंध किया जा रहा है..  खेत कम से कम उर्वरक होते जा रहे हैं.. अभी भी सिंचाई के वक्त किसान खेतों को  पानी से भर देते हैं जिससे उत्पादन में भारी कमी आ जाती है कुल मिलाकर वैज्ञानिक खेती का भारी अभाव 

  खेती के अलावा दूसरे रोजगार के साधन अत्यंत ही कम है.. जिसकी वजह से प्रच्छन्न बेरोजगारी जिसे हम छुपी हुई बेरोजगारी भी कहते हैं बड़े पैमाने पर है ..इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि खेती कभी भी वर्ष भर रोजगार नहीं दे पाती.. खेती में सिर्फ कुछ महीनों के लिए ही काम रहता है और अधिकतर समय किसान बिल्कुल खाली होता है ..आधुनिक पशुपालन ना होने की वजह से और पशुओं की संख्या कम होने की वजह से भी पशुपालन में उन्हें अधिक रोजगार नहीं मिल पा रहा है. इसके साथ-साथ ग्रामीण उद्योगों का भी बहुत अभाव है ..स्थिति ऐसी है कि मैंने गांव में गर्मियों के दौरान हमेशा किसानों को सिर्फ ताश खेलते हुए ही पाया है और अधिकतर समय किसान व्यर्थ की धार्मिक चर्चाओं  एवं किस्से-कहानियों में समय बिता रहे हैं ..हालांकि मैं यह नहीं कहता कि यह ग्रामीण संस्कृति समाप्त हो जाए लेकिन फिर भी काम करने का समय तो हमें बढ़ाना ही होगा अगर हम अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारना चाहते हैं ..

इसके साथ-साथ जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वह यह है कि किसानों के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल ही नहीं पा रही है किसानों के बच्चे जहां शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं उन विद्यालयों में, अगर  सरकारी विद्यालय हैं ,तो शिक्षण न के बराबर ही है ..और उनके बच्चे 12वीं पास करके आगे बढ़ते हैं तो वहीं सरकारी नौकरियों की तैयारी करने के लिए शहरों में जाते हैं.. जिन सरकारी नौकरियों में न के बराबर जगह है और सभी किसानो के बच्चे तैयारी में लगे हुए हैं …बड़े पैमाने पर अपना धन किसान उन बच्चों पर खर्च कर रहे हैं जिन्हें नौकरी मिलने की कोई संभावना नहीं है और इन बच्चों को आधुनिक खेती करने के तौर-तरीके भी नहीं सिखाया जा रहे हैं ..इसके साथ-साथ बच्चे खेती को छोटा कार्य भी समझते हैं जिसकी वजह से वह वापस लौटकर कभी भी खेती में जाना नहीं चाहते ..परिणाम स्वरुप स्थिति ऐसी हो चुकी है कि खेती हाशिए पर खड़ी हुई है…

इसके अलावा किसान की दुर्दशा के लिए उस की सामाजिक स्थिति भी जिम्मेदार ह ..उसके समाज में जातिवाद और दूसरे अनेक प्रकार के अंधविश्वास बहुत गहराई तक व्याप्त है ..अभी भी दहेज प्रथा और स्त्री की दुर्दशा के कारण उनकी अर्थव्यवस्था में योगदान न के बराबर है.. यह स्थिति इतनी भयानक है की गांव की जनसंख्या तेजी के साथ बढ़ती रहती है और उत्पादन में कोई खास वृद्धि नहीं हो रही है परिणाम स्वरुप गरीबी बढ़ रही है..

  किसान की भयानक स्थिति के जानने के बाद आप स्वयं ही समझ सकते हैं कि उस स्थिति से उसे बाहर निकालने के लिए वैज्ञानिक सोच और एक स्वतंत्र आर्थिक विचार की आवश्यकता है..

चंद आंसुओं में तर निगाह की तरह मैं याद भी तो हूं पर गुनाह की तरह 

चंद आंसुओं में तर निगाह की तरह
मैं याद भी तो हूं पर गुनाह की तरह

कोई खत 

कोई ख्वाब

कोई फूल
कोई किताब

कोई जिक्र
कोई याद
कोई लम्हा
कोई बात

कोई शिकवा
कोई गिला
कोई टूटा
सिलसिला

कुछ भी नहीं रहा
मगर कुछ तो रह गया

अंधेरों से जूझते चराग की तरह
चंद आंसुओं में तर निगाह की तरह
मैं याद भी तो हूं पर गुनाह की तरह

आंखे तर ….
कोई ख्वाब

मुद्दतों से….

दरबदर

इसका इश्क
उसका सितम
तेरी दुआ
उनका रहम

सब मिलता रहा
अधूरा अधूरा

बेचैन मन कसमसाता रहा
होठों में कुछ तो छुपाता रहा

किसी गीत में उलझी आह की तरह
चंद आंसुओं में तर निगाह की तरह
मैं याद भी तो हूं पर गुनाह की तरह

कभी घर कोई तन्हा सा देखा तो होगा ही

इसे अफ़सोस मत समझो इसे मैं जश्न कहता हूं तड़पता हूं अकेले में मगर महफिल में हंसता हूं 

खुद से रूबरू होने की आदत आ गई मुझको आजकल तनहाई का जिक्र भी करता नहीं हूं मैं 

हर एक आंख का पानी अपनी आंख पर पाया        हर  रूह के जरिए मेरा  किस्सा  उतरा आया 

हसरत दूर तक जाने की पैरों में अभी भी है.         मगर अब इनकी बेचैनी में एक ठहराव आया है 

दौड़ने की जो लज्जत थी वह भी देख ली हमने     फुर्सत से चलने का मजा अब पहली बार आया है 

मैं अपने हृदय के हालात को अल्फाज कैसे दूं।     कभी घर कोई तन्हा सा देखा तो होगा ही

भला किस बात का गम हो 

मुझे कैसी कमी हो अब 

मुझे तबस्सुम उनकी भी है

मुझे वह चेहरे दिखते हैं
जो मुझ पर खूब हंसते हैं
मुझे वह नजर.. नजर नहीं आती
जो मुझको छुपके तकती हैं

जिनकी हर अदा के लिए
मैं वर्षों तक जिंदा रहता हूं
वह मुझको देखकर पलटे आंखें अपनी..
… मैं अफसोस करता हूं

मगर वह जो
मुझे हर रोज अपने ख्वाब में सजाए बैठे हैं
मुझे हर रोज सब कुछ देने का जो वादा करते हैं 

मुझे उनकी तमन्ना , कभी गर्व नही होता

अपनी हर नाकामी पर एक अफ़सोस होता है

जो मिला नहीं ….
उसको पाने की कुछ इस तरह की कशमकश है

जो मिल रहा है ….वह मुझे तीखा सा लगता है

मगर फिर भी वह आंखें जो मुझ को तकती हैं
जो मेरे एक अवसर के लिए
अपना सब सब्र तक खो चुकी हैं
मैं उनको ताउम्र धन्यवाद देता रहता हूं

वह मुझे मुझसे भरोसा दिलाती है
वह मुझसे बार-बार कहती हैं .. तुम अकेले नहीं हो
जो मुझे हर वक्त सहलाती हैं
बताती हैं …
कोई तो है जो तुम्हारी तमन्नाओं में बैठा है
जिनके होने से मेरी उम्मीद  बनी रहती हैं
मैं कैसे अफसोस करूं?…
और आंखों में आंसू कैसे छोड़ता चला जाऊं ?..

मुझे तबस्सुम तो उनकी भी है

मेरे जीवन में औरत

मैंने 

सोचा कि मैं अपनी मां के बारे में लिख.. क्योंकि मां मेरे जीवन में न केवल पहली औरत हैं बल्कि सबसे पहली इंसान भी हैं ..उन्होंने मुझे अपने जीवन में इतना दिया है कि ना तो मैं उसके बारे में लिख सकता हूं , ना कह सकता हूं , ना बता सकता हूं.. मैं कोशिश करूंगा लेकिन सफल नहीं हो पाऊंगा ..इसलिए मैंने फैसला किया कि मैं अपनी मां के बारे में नहीं बल्कि अपने जीवन में आई उन दूसरी औरतों के बारे में लिखूंगा जिन्होंने मेरे जीवन को बनाने में बहुत महत्वपूर्ण है योगदान दिया है ..जो मेरे जीवन की सच्चाई है जो मेरे जीवन का अनुभव है अगर वह मेरी जीवन में ना आई होती तो मैं कितना.  कमजोर रह जाता …मैं उन का आभारी हूं …..

इसलिए आज मैं उन औरतों के बारे में लिखूंगा जो मेरी हम-उम्र हैं या मुझसे दो तीन या चार पांच वर्ष बड़ी या छोटी हैं ..यह औरत है जो मेरे जीवन में एक रंग लाती हैं, इसे सुंदर -समझने योग्य बनाती हैं …

एक समय था जब मेरी यह स्थिति थी कि मैं अपनी क्लासमेट लड़कियों तक से बात भी नहीं कर पाता था या यह कहे कि हमारी कक्षा में कुछ इस तरह का माहौल था कि लड़क लड़कियां आपस में कभी बात ही नहीं करते थे.. और मुझे बड़ा अफसोस है कि आज भी हमारे समाज में ऐसी स्थितियां बरकरार  हैं …आदमी और औरत  एक दूसरे से मित्रता भी नहीं कर पाते हैं… यह कैसी स्थिति है !! क्या आदमी और औरत different  species  हैं ….आखिर वो एक दूसरे से मित्रता क्यों नहीं कर सकते ? ..भयानक प्रश्न है ..लेकिन इसका जवाब किसी के पास नहीं है. कोई भी धार्मिक ठेकेदार इस प्रश्न का जवाब देने की हिम्मत कभी नहीं कर पाता है ..उन्होंने जो दूरियां खड़ी कर दी है वह इतनी आसानी से भरी नहीं जा सकती और उसके परिणाम हमारी सभी जातियां और वर्ग महसूस करते हैं….. 

कोमल उम्र में बनाई गई मित्रता ही सच्चे अर्थों में निस्वार्थ मित्रता होती है .बाद में स्वार्थ प्रमुख होता है ..

अपनी गलती सुधारने की कोशिश भी की मैंने. .या कुदरत ने ही मेरी गलती सुधार दी .आज मेरी चार लड़कियों से अच्छी मित्रता है …जी हां, “मित्रता “है …

मेरी एक मित्र राजनीतिक रुप से अत्यंत जागरुक है वह वर्तमान में बहरीन देश में है ..उसके साथ अक्सर WhatsApp पर अच्छी इंटेलेक्चुअल टॉक्स होती रहती हैं.. और अक्सर रोजाना ही होती है.. मैं ऐसी मित्र पाकर बहुत खुश हूं उसने मेरे ज्ञान को और मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया है. .

 मेरी दूसरी मित्र successful CA बनने में प्रयत्नशील है ..मुझे उनका अपनी बात रखने का तरीका बहुत पसंद आया.. स्पष्ट एवं कम शब्दों में ..सीधी बात बोलती हैं .लेकिन न जाने क्यों , मुझे लगता है कि, इन से मेरी मित्रता strong नहीं हो पाई है.. कभी यह मेरी क्लासमेट भी रह चुकी है. .. लगता है हम आज बहुत अच्छे दोस्त बन सकते हैं .एक अच्छे समय आने की आशा है और वह समय जरूर आएगा …

मेरी तीसरी महिला मित्र मेरी बेस्ट फ्रेंड है ..यह एक विशाल, निस्वार्थ एवं मासूम हृदय की मालकिन है ..उसे अधिक राजनीति नहीं आती है और ना ही समाज की दूसरे विषयों पर एक टिप्पणी करती है लेकिन अपनी राय रखती है ..मैं उसके सामने अपने वास्तविक रुप में आ सकता हूं. मुझे गर्व है उस की मित्रता पर.. मैं ऐसे मासूम मित्र पाकर धन्य हूं ..

चौथी लड़की अभी सिर्फ 14 साल की है वह मेरी स्टूडेंट है ..मैं उसे अपनी मित्र भी मानता हूं वह महान है और उसकी महानता उसकी आंखों से झलकती है मुझे किसी प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है इसके लिए ..उसकी महानता उसके दृढ़ संकल्प में दिखती है.. वह  11th क्लास में पढ़ती है. . उसका लक्ष्य कितना स्पष्ट है उसके सामने.. वह अत्यंत सजी हुई एवं मासूम है ..जब भी मैं उसे पढ़ाता हूं मैं नई ऊर्जा से भर जाता हूं..

 यह चारों लड़कियां मेरे उस सपने का हिस्सा है जिसे में औरतों और दुनिया की आधी आबादी के लिए देखता हूं ..यह एक आशा की किरण है- उस सुबह की आशा है जिसकी अंधेरी रातों को मैंने देखा है.. यह लड़कियां उन लड़कियों के ख्वाबों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिनके ख्वाब उम्र चढ़ने से पहले टूटते हुए देखा है मैंने.. आपके पास भी ऐसी अनेकों कहानियां होगी और ऐसी भी अनेकों कहानियां होगी जिनमे दर्द छुपा होगा .. 

आपके जीवन को बना रही हैं

 लेकिन आप  कुछ महसूस नहीं कर पा रहे हैं ..

यह आपके जीवन का हिस्सा है .. आप खुद से कमतर कैसे मान लेते हैं ? 

और कैसे घटिया जोक्स आप WhatsApp और Facebook पर चलाते रहते हैं ?…

कैसे आप उस वक़्त खामोश रह जाते हैं जब एक लड़की को अपनी पढ़ाई आगे बढ़ाने से रोका जाता है ? 

और उस वक्त आप कैसे खामोश रह जाते हैं जब आपके माता पिता आपकी शादी के लिए दहेज की बात करते हैं ? .

आप उस वक्त कैसे खामोश रह जाते हैं जब एक महिला को उसका जीवन साथी चुनने की आजादी नहीं दी जाती ? .

आप उस वक्त कैसे खामोश रह जाते हैं जब आपकी किसी भी साथीको  train या किसी बस में जबरदस्ती कोई अनुचित ढंग से छूने का प्रयास करता है? .

आप उस वक्त कैसे खामोश रह जाते हैं जब मीडिया फिल्मों और विज्ञापनों में औरत एक वस्तु की तरह प्रदर्शित की जाती है ? .

उन कहानियों को तलाशने की कोशिश कीजिए जिनमें औरतों और आप दोनों शामिल हैं.. जो आप का एक हिस्सा है.. आपकी शख्सियत का एक महत्वपूर्ण भाग.. 

अगले एपिसोड में मैं अपने गांव की 5 लड़कियों की कहानी सुनाऊंगा ..एक कड़वी सच्चाई ..एक दर्दनाक कहानी जो मेरे जीवन की पथ प्रदर्शक बनी हुई है..

अंत में मैं दुनिया की तमाम औरतों से कहना चाहता हूं…

                 तुम मां हो 

                   बहन हो 

              बेटी हो पत्नी हो 

               और प्रेमिका हो 

            लेकिन तुम औरत हो 

        उससे भी पहले तुम इंसान हो 

        सबसे पहले तुम एक रूह हो 

            जो सभी के अंदर है 

             सभी  एक जैसे हैं 

         मेरी भी और तुम्हारी भी

उसने अपनी राह चुनी

पैरों की पाजेब सिफर बनकर भी रह सकती थी 
पर उठते पैरों को हरगिज डरना तो मंजूर नहीं था 

खामोशी को उसने अपने गहनों में शुमार किया था
लेकिन कातर आंखों को चुप रहना तो मंजूर नहीं था

कई तरह के अर्थ निकाले लोगों ने उसके आंसू के
उसको अपनों की उंगली का उठना तो मंजूर नहीं था

सांसे भी चलती रहती गर वह चुप रह जाती उस दिन
घुट-घुटकर मरने की खातिर जीना तो मंजूर नहीं था

हम और कश्मीर

One of my friends was discussing with me on Kashmir issue. This is definitely a very controversial and emotional topic for most of the Indians. She said that Kashmir is integral part of India and we can not compromise on the issue then I have to explain certain issues and facts to her. Here are the messages which I wrote to her.

[26/04 2:37 pm] Deepak Tyagi: कश्मीर 

के लोग दो देशों की नफरत को बर्दाश्त कर रहे हैं. इतिहास में की गई गलती का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है .और यह गलती भी ऐसी है जिस को बदलने की हिम्मत तक ना तो भारत कर सकता है और ना ही पाकिस्तान कर सकता है. 

यह समस्या दोनों देशों और दो मजहबों की बीच के घमंड की है…. जब तक हम अपना अपना घमंड छोड़कर , सच में समस्या को सुलझाने के लिए तैयार नहीं होते कश्मीरी लोगों को यह दयनीय स्थिति बर्दाश्त करनी पड़ेगी. डर तो इस बात का लगता है की नफरत की इस आग में कहीं भारत और पाकिस्तान दोनों का ही भविष्य न जल जाए…. देशभक्ति की झूठी भावना ने हम दोनों ही देशों का बहुत नुक्सान किया है. बहुत अच्छा होता अगर हम यह जान पाते कि बंदूक के बल पर कभी  किसी पर control कर के नहीं रखा जा सकता.

[26/04 7:09 pm] Anuska: But Kashmir is an indifferent part of India…how can we give it to them. This is the most beautiful place in India and also a major source of revenue

[26/04 7:09 pm] Anuska: Besides, pak also has POK then also it is not satisfied

[26/04 7:53 pm] Deepak Tyagi: Who taught us that Kashmir is the integral part of India? this is the Government of India. this is the biggest propaganda of Government of India. in fact ,Kashmir was a princely state before independence and after independence, it was not the part of India .most of princely states either went with Pakistan or came with India but there were few which decided to remain independent .Kashmir was one of them and when the Pakistani militant attacked Kashmir,the king of kashmir  decided to go with India .what the term  used  was acquisition not  Merger. the Prime Minister of India promised them that there will be plebiscite after restoring peace there . But this peace could never be restored there.
Then, india changed its stand when mr Jawahar lal Nahru realised that Kashmir might decide to go with pakistan or remain independent if there will be any plebiscite. Other political parties also started reverberating that Kashmir is intregal part of india. In fact,  nobody execpt govt of india show kashmir as intregal part of India. They all term it as disputed area.
Meanwhile, govt of  india used its propaganda machine and converted it into a vote fetching issue. This become so sensitive issue that even mr B R Ambedkar lost election when he spoke against the mainsteam opinion. At the same time,  pakistani politicians were also propagating among their masses that india has illegally occupied a Muslim majority territory. According to their two nation theory kashmir  should be their part. But nobody was ready to listen kashmiris. They were mere spectator while their future was being destroyed.

[26/04 8:02 pm] Deepak Tyagi: किसी भी जगह ke निवासी hi वहां के मालिक होते हैं .और अगर हम बंदूक के बल पर या फिर आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट (AFSPA) jaise कानून बनाकर जबरदस्ती किसी पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं तो वही होता है जो कश्मीर में हो रहा है. कश्मीर के 93 परसेंट लोगों ने कश्मीर by इलेक्शन में भाग नहीं लिया ..क्या यह अपने आप में पूरा संकेत नहीं है कि कश्मीरी लोग भारत की सेना की वहां मौजूदगी से खुश नहीं है ? सबसे गंभीर प्रश्न तो यह है कि कश्मीर लोग भारत के साथ क्यों नहीं रहना चाहते ? ..कहीं ऐसा तो नहीं कि जबरदस्ती बल प्रयोग करके हमने कश्मीरियों के मन में अविश्वास पैदा कर दिया है? समाधान sirf yahi हो सकता है कि हम कश्मीरी लोगों के पास जाएं और उन्हें भरोसा दिलाएं कि उन्हें सेना के बल पर कब्जा नहीं किया जाएगा ..बल्कि उनकी इच्छाओं का आदर किया जाएगा उन्हें निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी जाएगी और कश्मीरी युवाओं को यह भरोसा भी दिखाना आवश्यक है कि पाकिस्तान के साथ जाने या एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की बजाय अगर ve भारत के साथ आते हैं तो ज्यादा खुश रहेंगे. 

बिना बराबरी के आधार पर बातचीत किए हम कश्मीर को कभी भी अपना अभिन्न अंग बनआ  नहीं पाएंगे .चाहे संविधानिक और राजनीतिक रुप से हम इस चीज को कितना भी प्रचार करते रहे…

[26/04 8:07 pm] Deepak Tyagi: तुम्हें इन तथ्यों की जांच करना चाहिए कि कश्मीर से भारत कितना रिवेन्यू गेट करता है… सच्चाई तो यह है कि कश्मीर से भारत बहुत ही कम राजस्व प्राप्त करता है. और इसकी वजह है हम कश्मीर और कश्मीर की सुरक्षा से जुड़े हुए मसलों पर बहुत बड़ी मात्रा में धन व्यय करते हैं . साथ hi हमारी सरकार को अपने कश्मीर प्रोपेगंडा को बनाए रखने के लिए भी धन खर्च करना पड़ता है ..हमारे पड़ोसी देश के साथ बहुत संबंध खराब है जिसकी वजह से हमें अपनी सेना पर भी बहुत अधिक खर्च करना पड़ता है. साथ ही साथ हमारे देश के महत्वपूर्ण मुद्दे भी सिर्फ कश्मीर समस्या की चर्चा करने के कारण चर्चा में नहीं आ पाते हैं …इसलिए कश्मीर आर्थिक रूप से कभी भी हमारे लिए लाभदायक  नहीं है और वर्तमान समय में कश्मीर खूबसूरत नहीं रहा है …वह अशांति का सबसे बड़ा symbol बन चुका है खूबसूरती सिर्फ और सिर्फ तभी आ सकती है जब कश्मीर में टोटली पीस Ho..

[26/04 8:17 pm] Deepak Tyagi: यह मामला कुछ उसी प्रकार का है जिस प्रकार china तिब्बत पर अपना दावा करती है ..और इसराइल फिलिस्तीन की जमीन पर कब्जा करने की लगातार कोशिश कर रहा है .Jis Prakar Africa Mein Europe ki colonial powers ne jabardasti Rekha khich kar desh bana diye aur Berlin ko divide Karke Uske Beech Mein   wall Kardi Gayi ..इस प्रकार के समाधान सिर्फ कुछ खुराफाती दिमाग को के अंदर ही आते हैं. वह लोग नहीं समझ पाते किसी क्षेत्र को विभाजित करने से उस क्षेत्र की sanskritiyan batane लगती हैं. लोगों का जीवन किसी स्तर पर प्रभावित होता है वह कभी सोच भी नहीं पाते… Kashmir Koi tokri mein Rakha Hua apple nahi hai Jis Ke do tukade kar Diye jaye aur Bharat Pakistan ko de diya Jayega.. Ye kuch logo ki Saja Zindagi Ka Pratik hai. Kashmir sirf aur sirf ek hi hona chahiye

[26/04 10:43 pm]Anushka:I am not in favour of violence but this place is so beautiful that it is impossible to apart with it

[26/04 10:43 pm] Deepak Tyagi: Definitely. You are right.

One of my  friends in Delhi is a Kashmiri. He says that Kashmir is very beautiful but natural beauty is useless for a place where curfew remains for more than 150 days in a year.

I also don’t want to be apart with this hasin vadi but we can not call kashmir ours because it is very beautiful. Only moral and valid way to make kashmir ours forever is to win the heart of the people. कश्मीर हमारा नहीं बल्कि हमें कश्मीर का बनना होगा. जब तक हम उन्हें महसूस नहीं कराते कि हम उनमें से ही हैं तब तक हमारा विश्वास नहीं कर सकते .http://www.thehindu.com/news/national/first-stop-throwing-stones-in-kashmir-then-will-set-stage-for-talks-sc/article18268370.ece?homepage=true

जब किसान ने आत्महत्या की

तू उन के जुर्म में इस तरह शरीक हो गया
तूने ने खुदकुशी की और तू शहीद हो गया

खामोश हो गए वो जुमला उछालकर
तू स्टार यू बना के ट्वीट पर ट्वीट हो गया

कुछ इस तरह सियासत पर तेरा नाम छा गया
मौत के बाद तो तू जैसे वजीर हो गया

तेरी बीवी ने इस बार तो होली मनाई होगी
उस को मुआवजे में रंगे अबीर हो गया

तेरा गांव भी मशहूर तेरी मौत से हुआ
सूखा कुआं भी प्राइम टाइम की तस्वीर हो गया

तूने मर के तो कमाल कर दिया, रे किसान !
तू मजबूर से हर दिल अजीज हो गया

तू उनके जुर्म में इस तरह शरीक हो गया
तूने खुदकुशी की और तू शहीद हो गया

बहुत बड़ा खतरा है

भीड़ भरे बाजार की सड़क पर
किसी मस्जिद की नमाज के बाद
या किसी मंदिर की दहलीज पर
दूर तक दौड़ती किसी ट्रेन के डिब्बे में
हर जगह बिखरे लाल रंग में
इंसानियत के लहू में
मज़हब की बुलंदी देखते हैं

बारूद के ढेर पर
बंदूक के साए में
हर रोज होते धमाकों के बीच
पड़ोसी की सिसकियों के स्वर में
कहीं आंखों के ख्वाब टूटते हैं

कुरान खतरे में है
इस्लाम खतरे में है
हर एक आजाद खयाल एक साजिश है
तालीम अमेरिका के द्वारा फैलाया गया
एक दुश्मनी एजेंडा है
हर तरह से कुछ ऐसा माहौल है
जैसे खुदा खतरे में है
उसे बॉडीगार्ड की जरूरत है

Yaadein purani

जेठ के तपते भानु में
एक दहकते शिलाखंड पर
जमीन के सीने में
तड़पती खिंच लाती है
एक मेघ का टुकड़ा
आंधी में फंसा अकेला बादल
चंद बूंदें गिराने को मजबूर
शोक मनाता चला जाता है

चट्टान पर गिरते ही
पानी की सुकुमार बूंदें
दहक उठती हैं
वापस उसी ओर
जहां से एक रोज आई थी
तपती भूमि अगर सीने मे धड़कती है
तो बूंदें पुरानी यादें हैं सीने में
बादल यादों का पिटारा है