उसने अपनी राह चुनी

पैरों की पाजेब सिफर बनकर भी रह सकती थी 
पर उठते पैरों को हरगिज डरना तो मंजूर नहीं था 

खामोशी को उसने अपने गहनों में शुमार किया था
लेकिन कातर आंखों को चुप रहना तो मंजूर नहीं था

कई तरह के अर्थ निकाले लोगों ने उसके आंसू के
उसको अपनों की उंगली का उठना तो मंजूर नहीं था

सांसे भी चलती रहती गर वह चुप रह जाती उस दिन
घुट-घुटकर मरने की खातिर जीना तो मंजूर नहीं था

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