किसान की स्थिति

जिले में किसान अपनी कुछ मांगों को मनवाने के लिए हिंसक प्रदर्शन और आंदोलन कर रहे हैं.. वे सब्जियां फल एवं दूध सड़कों पर फैला कर विरोध कर रहे हैं. 

उनकी कुछ मांग इस प्रकार हैं- कर्ज माफी, दूध के रेट बढ़ाएं जाएं ,फसल के खर्च का डेढ़ गुना दाम मिले,  किसानों पर दर्ज केस वापस लिए जाएं… और महाराष्ट्र में भी किसान आंदोलन चल रहा है ..वहां किसानों की इसी प्रकार की मांगे हैं -कर्जमाफी, प्रोडक्शन कॉस्ट से 40 परसेंट ज्यादा एमएसपी, पेंशन, बिना ब्याज का लोन इत्यादि इत्यादि.. ( मेरी जानकारी का स्रोत दैनिक भास्कर है)

 अगर एक सीधा आकलन किया जाए तो किसान इस प्रकार की मांग कर रहे हैं जिन्हें एक स्वतंत्र बाजार अर्थव्यवस्था में सरकार के नियंत्रण में होना ही नहीं चाहिए 

इस  को पढ़कर कुछ लोगों को लग सकता है कि मैं किसान विरोधी हूं लेकिन वास्तविकता में अपनी निजी अनुभवों एवं अर्थव्यवस्था की सरल समझ के आधार पर ही मैंने अपनी राय बनाई है और मैं किसानों की चिंता करते हुए देखने की बजाए हालात के वास्तविक सुधार के बारे में काम करना पसंद करता हूं..

 इस आंदोलन के पीछे जो मूल अवधारणा है वह कल्याणकारी राज्य की अवधारणा है. या यह है कि हम कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से भ्रमित हो चुके हैं.. किसान चाहते हैं कि सरकार अपने revenue से उनके कर्ज की भरपाई करें , मार्केट रेट से अधिक कीमत दें, और उनके रिस्क को अपने खजाने पर बहन करे. 

मैं मंदसौर का नहीं हूं लेकिन मुरैना के एक किसान का ही बैठा हूं.. मैंने गांव को बेहद नजदीक से देखा है मैंने अपने अनुभवों के आधार पर ही यह निष्कर्ष निकाले और इसी के आधार पर मैं कह सकता हूं कि किसानों की खस्ता आर्थिक हालत के असली कारण क्या है.. पहला कारण है कृषि में रोजगार पाने वाले लोगों की संख्या कृषि क्षेत्र की आवश्यकता से बहुत अधिक है इसके कारण किसान अपनी खेती करने की पद्धति को आधुनिक करने के लिए आवश्यक पूंजी कभी जमा ही नहीं कर पाता.. खेतों का आकार छोटा होता जा रहा है.. लोगों की संख्या अधिक होने के कारण मशीनीकरण की ओर बढ़ना भी लाभप्रद नहीं हो पाता जिससे प्रगति की रफ्तार बहुत धीमी हो जाती है ..पूंजी निर्माण हो नहीं पाता है खेत छोटे हो जाते हैं इसलिए उनका आधुनिकीकरण भी नहीं हो पाता है 

दूसरा कारण गांव के लोग बैंक से लोन लेते ही नहीं है ..अक्सर यह बातें की जाती है कि किसान कर्ज न चुकाने की वजह से आत्महत्या कर लेते हैं वास्तविकता यह है कि उनके आत्महत्या करने के और भी दूसरे बहुत से कारण हैं जिन पर हमारा ध्यान ही नहीं जा पाता है. . किसान क्रेडिट कार्ड में इतनी धांधली है कि यह क्रेडिट कार्ड उस व्यक्ति के पास नहीं होते जिस जरूरत है बल्कि उसके पास होते हैं जो इनको बनवाने की बारीकियों को जानता है और रिश्वत देने की art में प्रवीण है.. .ज्यादातर गरीब किसान धनी एवं Dabangg किसानों से ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज लेते हैं ..यह कर्जदाता कोई गारंटी नहीं लेते बल्कि अपने बल पर शक्ति से अपने कर्ज की वसूली करते हैं ..मेरे गांव में कई किसान इस प्रकार की कर्ज बांटने की व्यवस्था से धनी हो गए हैं… जो लोग कर्ज़ लेते हैं , खेती के लिए तो शायद ही कभी लेते हैं.. ज्यादातर तो लड़की की शादी किसी परिजन की मृत्यु भोज के लिए ,बीमारी आदि के इलाज करने के लिए और कभी-कभी कुछ विलासिता की चीजें जैसे TV आदि खरीदने के लिए फोन खरीदने के लिए .;और कभी-कभी जुए में हार जाने की वजह से भी कर्ज लेते हैं क्योंकि इनमें से कोई भी उत्पादक कार्य नहीं हो सकता इसलिए किसान debt trap mein फस जाता है .. 

अधिकतर अनाज की फसल होती हैं इसका कारण है कि भी दूसरी उपयोगी फसले जैसे फल सब्जियां तिलहन दल्हन  की तकनीक में भी  किसान उतना नहीं पारंगत हो पाया है. सब्जियों  के भंडारण की भी व्यवस्था उतनी अच्छी नहीं है जिसके कारण किसान लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रख सकता और उनके बजाय मूल्य पाने का इंतजार नहीं कर सकता. .उसे अपनी फल और सब्जियां तुरंत बेचने पड़ते हैं …स्थिति तब और खराब हो जाती है जब किसी फसल के अधिक उत्पादन की वजह से उसकी कीमत  एकदम नीचे आ जाती हैं कई बार तो ऐसी स्थिति आ जाती है कि उसे अपनी लागत भी पूरी नहीं मिल पाती ऐसी स्थिति ही किसानों के लिए सबसे भयानक होती है …न्यूनतम समर्थन मूल्य का जो कांसेप्ट आया है वह भी इसी भयानक स्थिति से बचने के लिए आया है… भंडारण की कमी की वजह से बहुत बड़ी मात्रा में उत्पादित माल नष्ट हो जाता है  ..  

 उसका माल कई उपभोक्ताओं से होकर कई बिचौलियों से होकर उपभोक्ता तक पहुंचता है जिसके कारण उपभोक्ता को तो कीमत अधिक चुकानी पड़ती है लेकिन वह मूल्य किसान तक हस्तांतरित नहीं हो पाता है परिणाम स्वरुप बाजार में बढ़ रही महंगाई किसान तक नहीं पहुंच पाती और किसान गरीब का गरीब रह जाता है   

 आज खेती बड़े पैमाने पर बारिश पर निर्भर है ..कहीं-कहीं पर सिंचाई के लिए ट्यूबवेल और नहर आदि का प्रयोग किया जा रहा है लेकिन इससे भूमिगत जल का छरण भी लगातार हो रहा है और वह इतना कम हो गया है कि अब उसके रिचार्ज करने के बारे में सोचना अत्यंत जरुरी हो गया है .. 

सिंचाई और जुताई अभी भी अवैज्ञानिक तरीकों से की जा रही है आधुनिक बीजों कीटनाशकों खरपतवारनाशकओं का प्रयोग तो न के बराबर किया जाता है. . मिट्टी के परीक्षण किए जाने के बारे में तो कोई जानता ही नहीं है.. और रासायनिक खादों का प्रयोग अंधाधुंध किया जा रहा है..  खेत कम से कम उर्वरक होते जा रहे हैं.. अभी भी सिंचाई के वक्त किसान खेतों को  पानी से भर देते हैं जिससे उत्पादन में भारी कमी आ जाती है कुल मिलाकर वैज्ञानिक खेती का भारी अभाव 

  खेती के अलावा दूसरे रोजगार के साधन अत्यंत ही कम है.. जिसकी वजह से प्रच्छन्न बेरोजगारी जिसे हम छुपी हुई बेरोजगारी भी कहते हैं बड़े पैमाने पर है ..इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि खेती कभी भी वर्ष भर रोजगार नहीं दे पाती.. खेती में सिर्फ कुछ महीनों के लिए ही काम रहता है और अधिकतर समय किसान बिल्कुल खाली होता है ..आधुनिक पशुपालन ना होने की वजह से और पशुओं की संख्या कम होने की वजह से भी पशुपालन में उन्हें अधिक रोजगार नहीं मिल पा रहा है. इसके साथ-साथ ग्रामीण उद्योगों का भी बहुत अभाव है ..स्थिति ऐसी है कि मैंने गांव में गर्मियों के दौरान हमेशा किसानों को सिर्फ ताश खेलते हुए ही पाया है और अधिकतर समय किसान व्यर्थ की धार्मिक चर्चाओं  एवं किस्से-कहानियों में समय बिता रहे हैं ..हालांकि मैं यह नहीं कहता कि यह ग्रामीण संस्कृति समाप्त हो जाए लेकिन फिर भी काम करने का समय तो हमें बढ़ाना ही होगा अगर हम अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारना चाहते हैं ..

इसके साथ-साथ जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वह यह है कि किसानों के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल ही नहीं पा रही है किसानों के बच्चे जहां शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं उन विद्यालयों में, अगर  सरकारी विद्यालय हैं ,तो शिक्षण न के बराबर ही है ..और उनके बच्चे 12वीं पास करके आगे बढ़ते हैं तो वहीं सरकारी नौकरियों की तैयारी करने के लिए शहरों में जाते हैं.. जिन सरकारी नौकरियों में न के बराबर जगह है और सभी किसानो के बच्चे तैयारी में लगे हुए हैं …बड़े पैमाने पर अपना धन किसान उन बच्चों पर खर्च कर रहे हैं जिन्हें नौकरी मिलने की कोई संभावना नहीं है और इन बच्चों को आधुनिक खेती करने के तौर-तरीके भी नहीं सिखाया जा रहे हैं ..इसके साथ-साथ बच्चे खेती को छोटा कार्य भी समझते हैं जिसकी वजह से वह वापस लौटकर कभी भी खेती में जाना नहीं चाहते ..परिणाम स्वरुप स्थिति ऐसी हो चुकी है कि खेती हाशिए पर खड़ी हुई है…

इसके अलावा किसान की दुर्दशा के लिए उस की सामाजिक स्थिति भी जिम्मेदार ह ..उसके समाज में जातिवाद और दूसरे अनेक प्रकार के अंधविश्वास बहुत गहराई तक व्याप्त है ..अभी भी दहेज प्रथा और स्त्री की दुर्दशा के कारण उनकी अर्थव्यवस्था में योगदान न के बराबर है.. यह स्थिति इतनी भयानक है की गांव की जनसंख्या तेजी के साथ बढ़ती रहती है और उत्पादन में कोई खास वृद्धि नहीं हो रही है परिणाम स्वरुप गरीबी बढ़ रही है..

  किसान की भयानक स्थिति के जानने के बाद आप स्वयं ही समझ सकते हैं कि उस स्थिति से उसे बाहर निकालने के लिए वैज्ञानिक सोच और एक स्वतंत्र आर्थिक विचार की आवश्यकता है..

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