कभी घर कोई तन्हा सा देखा तो होगा ही

इसे अफ़सोस मत समझो इसे मैं जश्न कहता हूं तड़पता हूं अकेले में मगर महफिल में हंसता हूं 

खुद से रूबरू होने की आदत आ गई मुझको आजकल तनहाई का जिक्र भी करता नहीं हूं मैं 

हर एक आंख का पानी अपनी आंख पर पाया        हर  रूह के जरिए मेरा  किस्सा  उतरा आया 

हसरत दूर तक जाने की पैरों में अभी भी है.         मगर अब इनकी बेचैनी में एक ठहराव आया है 

दौड़ने की जो लज्जत थी वह भी देख ली हमने     फुर्सत से चलने का मजा अब पहली बार आया है 

मैं अपने हृदय के हालात को अल्फाज कैसे दूं।     कभी घर कोई तन्हा सा देखा तो होगा ही

भला किस बात का गम हो 

मुझे कैसी कमी हो अब 

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